Saturday, April 16, 2016

इंटरनेट का प्रेमजाल

इंटरनेट का प्रेमजाल
------------------------ संजीव निगम
आजकल मैं इस बात को मजबूती से महसूस  कर रहा हूँ कि अगर पूरे विश्व  में
लडकियाँ  किसी एक व्यक्ति पर मर मिटने को उतारू  हैं तो वह मैं हूँ। यह
एकमात्र प्रेम पुरुष होने की भावना  मेरे मन में उतनी ही गहरी है जितनी हर
नेता के दिल में देश का  एकमात्र ईमानदार व्यक्ति होने की ।  
मुझसे मिलने के लिए , मुझ पर अपना  प्यार लुटाने के जितने ऑफर मुझे हर रोज़
मिलते हैं  उन्हें देख कर मैं अपना कम्पटीशन अब सीधे भगवान कृष्ण से देखता
हूँ।   बल्कि मेरा यह मानना है कि प्रेम की इस ओपन मार्किट में मैं उनसे कई
कदम आगे निकल गया हूँ।  उन्हें  तो सिर्फ बृज  की गोपियों ने ही प्यार किया था
पर मेरे लिए तो ऐसे ऐसे देशों की कन्याओं ने प्यार का तूफ़ान उठाया हुआ है
जहाँ  जाने के लिए हवाई जहाज़ का टिकट तक खरीदने की मेरी औकात नहीं है।
भगवान श्री कृष्ण ने तो बचपन से ही ऐसे पराक्रम दिखाए थे कि उनकी तरफ गोपियों
का आकर्षित हो जाना ऐसे ही स्वाभाविक  था जैसा कोंग्रेसियों का राहुल जी की
तरफ।  पर मैं ! मैं तो भारतीय मध्यम वर्ग का बंदा  हूँ जिसके लिए पराक्रम का
एक ही अर्थ होता है बिना किसी से उधार लिए एक तारीख से तीस तारीख तक घर चला
लेना।  लेकिन अगर नसीब में ऐयाशी लिखी हो तो जंगल में भी डिस्कोथिक मिल सकता
है।  ऐसा ही मेरे साथ हो रहा है।  मेरे ईमेल के इनबॉक्स में एक ही दिन में
अर्पा , सरिता , असरा खान , काजल , हुओंग त्राण , प्रियंका , डाला सराओ ,
चम्पा बाइन सबके प्रेम सन्देश एक साथ आते हैं और ऐसे सन्देश रोज़ आते हैं,  वह
भी नयी नयी लड़कियों के।   रोज़  नयी नयी बालाओं का प्रेम प्रलाप।  सब मुझसे
प्यार करने को बेताब।  ओह !  ऐसा लगता है जैसे ये मेरा ईमेल अकाउंट नहीं बल्कि
प्रेम डॉट कॉम की वेब साइट है।  मुझे ऐसा  महसूस होता  है जैसेकि द्रौपदी की
जगह मेरा स्वयम्बर हुआ जा रहा है।  मेरा बस चले तो इन सबके गले में वरमाला डाल
दूँ।  धर्मनिरपेक्षता और अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव बढ़ाने की दिशा में इससे ज़्यादा
 टिकाऊ काम और क्या हो सकता है ?
वैसे मेरा ईमेल सिर्फ  प्रेमिकाएं सप्लाई करने का ए  टी  एम ही नहीं  है ,
 पौंड , डॉलर और यूरो निकालने का भी है।  रोज़ मेरे पास ऐसे सन्देश आते हैं
जिनसे मुझे पता चलता है कि अफ्रीका के किसी देश में किसी  बेऔलाद बुढ़िया ने
इसलिए मरना मंज़ूर कर लिया  क्योंकि उसे मेरे रूप में अपनी  लाखों डॉलर की रकम
का वारिस मिल गया  । कोई लाखों पौंड की अंतर्राष्ट्रीय लॉटरी  के इनाम की रकम
मेरे खाते में ट्रांसफर हो जाने के लिए ऐसे मचल रही है जैसे कोई शराबी ड्राई
डे के दिन शराब के लिए मचलता है। ये तो ईमानदारी की मेरी खानदानी  बीमारी ने
कमज़ोर कर रखा है वरना अभी तक तो मैं अम्बानी से भी ऊपर होता।
पैसे और प्यार का ऐसा अद्भुत संयोग मेरी कुंडली में लिखा है इसे देख कर तो जलन
के मारे मेरी कुंडली बनाने वाले ज्योतिषी के मन में आत्महत्या के विचार आने
लगे हैं।  लेकिन अब तो बात  बहुत आगे तक बढ़ गयी है।  मुझसे प्यार जताने वालों
ने अति कर डाली है क्योंकि  आज तो किसी प्रेम नारायण का प्रेम निवेदन आ गया
है।
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Wednesday, October 12, 2011

Dharamnirpekshta ke Thekedar

धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार
------------------------------- संजीव निगम [मो.9821285194]
वे कोई आम नेता नहीं थे. बल्कि सामाजिक व राजनैतिक दृष्टि से घोषित रूप से धर्मनिरपेक्ष नेता थे. अक्सर अखबारों में उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि फोटो समेत छपती रहती थी. शहर के प्रायः सभी धर्मनिरपेक्षता सम्बन्धी समारोहों में वे ऐसी ही प्रमुखता से सुशोभित होते थे जैसे किसी डिस्कोथीक में डीजे . इसी प्रकार वे निरपेक्ष भाव से शहर की समस्त धर्मनिरपेक्ष संस्थाओं व दलों को अपनी उपस्थिति से उपकृत करते रहते थे.दूरदर्शन पर जब भी कोई धर्मनिरपेक्षता सम्बन्धी कार्यक्रम होता तो उसमे वे हमेशा मौके की जगह बैठे हुए सीधे कैमरे में झांकते दिखाई पड़ा करते थे.

मुझे उनकी यह सर्वव्यापी छवि हमेशा आकर्षित करती रही थी. इसलिए एक दिन जब वे अचानक मेरे सामने पड़ गए तो मैंने आव देखा न ताव और किसी लक्ष्यभेदी मिसाइल की तरह सीधा उनके चरणों में जा गिरा. श्रद्धा के इस अप्रत्याशित हमले से वे जब तक संभलते , तब तक मै उनके धूल धूसरित चरणों की धूल कुछ कम कर चुका था. अब तक वे भी प्रसन्न हो गए थे.
मैंने किसी घिसे हुए चमचे से गदगदाए स्वर में उनसे कहा, " मान्यवर, मै आपका बहुत बड़ा और बहुत पुराना प्रशंसक हूँ. और आपकी विचारधारा से तो सौ फीसदी प्रभावित हूँ." यह सुनकर वे आदतन मुस्कराए और फिर बड़प्पन से बोले, " लाखों लोग हमसे प्रभावित हैं.इसमें नयी बात क्या है." मैंने अपने जुड़े हुए हाथों को उनके कमल नयनो के फोकस में लाकर कहा," नयी बात है प्रभु, नयी बात है. आपकी विचारधारा ने मुझ पर वह जादू कर रखा हैकि मैंने आपको अपना द्रोणाचार्य और खुद को आपका एकलव्य मान रखा था . पर मै चाहता हूँ कि अब ये विडियो कोंफेरेंसिंग टाइप रिलेशनशिप ख़तम हो और आप मुझे अपनी सीधी शागिर्दी में ले लें."
वे कुछ जल्दी में थे , बोले,"बेटा , अभी ज़रा मै जल्दी में हूँ. एक मंदिर निर्माण समिति की बैठक में भाग लेने जाना है. फिर कभी फुर्सत से बात होगी." यह कह कर उन्होंने कदम आगे बढाया ही था कि मैंने पालतू कुत्ते की तरह लपक कर उनका कुर्ता पकड़ लिया. मैंने कहा ,"अच्छा , मंदिर निर्माण समिति की बैठक में जा रहे हैं, तो फिर वापसी में किसी मस्जिद निर्माण समिति की बैठक में भी अवश्य जायेंगे. अक्सर अखबारों में पढता रहता हूँ कि आप अपनी धर्मनिरपेक्षता को साबित करने के लिए सभी धर्मों के धर्मस्थलों का दबादब दौरा करते रहते हैं." मैंने यह कह कर इस धर्म प्राण देश के धर्मनिरपेक्ष आन्दोलनों पर अपनी गहरी पकड़ प्रर्दशित करनी चाही.
उन्होंने मुझे उपेक्षा की दृष्टि से देखा और कहा," बेटा, भावुकता के स्वीमिंग पूल में गोते मत लगाओ. तुमने जो पढ़ा है वह हमारा सार्वजनिक जीवन है और ये जो तुम देख रहे हो वह हमारा निजी एवं गोपनीय जीवन है." किसी गुप्तरोग जैसे उनके इस छिपे रूप ने मुझे और भी ज्यादा प्रभावित किया.धरम और निरपेक्षता का कैसा अद्भुत सामंजस्य था.मै उनका चेला बनने के लिए उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गया था. वे जहाँ कहीं भी अपनी धर्मनिरपेक्षता के फूल बिखेरने जाते , मैं उनके साथ ऐसे चिपका रहता था जैसे अमिताभ के साथ अमरसिंह चिपका रहा करते थे . अब दूरदर्शन पर उनके ठीक पीछे बैठे हुए मेरा दिखना भी अनिवार्य सा हो गया था. उनकी सभाओं में उपस्थित रहनेवालों की सूची में मेरा नाम स्थायी रूप से दर्ज हो गया था.
उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि के मद्देनज़र उन पर चुनाव लड़ने के लिए सभी धर्मनिरपेक्ष दलों की ओर से भारी दवाब था.आखिरकार एक दिन वे एक धर्मनिरपेक्ष दल की ओर से चुनावी रणभूमि में कूद पड़े. ज्यों ज्यों चुनाव प्रचार तेज होता गया, उनकी धर्मनिरपेक्षता में भी निखार आता गया.वे किसी नक्षत्र की तरह मंदिरों,मस्जिदों,गिरजाघरों की निरंतर परिक्रमा करने लगे थे.कभी वे किसी देवी जागरण में मुख्य अतिथि होते तो कभी किसी मस्जिद के बाहर खड़े नमाज़ ख़त्म होने का इंतजार कर रहे होते थे. बीच में समय निकाल कर गुरूद्वारे की सीढियाँ भी धो डालते थे. उन दिनों वे जहाँ भी जाते थे उसी धर्म के गुण गाने लगते थे.लेकिन अपनी इस धर्मनिरपेक्ष धार्मिकता के बावजूद वे चुनावी संग्राम में वीरगति को प्राप्त हो गए . उन्होंने टीवी कैमरों के सामने इसे सांप्रदायिक ताकतों का षड्यन्त्र बता कर जी भर कर अपनी भड़ास निकाली.कुछ दिनों तक मातम मनाने के बाद, वे चुनावी शहीदों को इकट्ठा करके कोई सातवाँ - आठवाँ मोर्चा बनाने में जुट गए और मैं अपने लिए कोई नया भविष्य तलाशने में जुट गया था.
काफी दिनों बाद उनसे पुनः भेंट हुई तो वे कुछ दुखी से दिखे. मैंने औपचारिकता वश कारण पूछा तो वे फट पड़े, बोले," क्या बताऊँ आजकल अपना बेटा एक विधर्मी लड़की के चक्कर में पड़ा हुआ है और शादी करने की जिद कर रहा है." मैंने कहा ," तो इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है?वह तो आपकी सार्वजनिक छवि को ही मजबूत कर रहा है." उन्होंने इस बार अपने ओसामा नेत्रों से मुझे घूरा और आगे बढते हुए बोले,"ऐसी की तैसी साले सिद्धांतों की. मैं तो ये सोच कर परेशान हूँ कि किसी दूसरे धरम की लड़की के हाथ की रोटी कैसे खाऊँगा." इस बार फिर से उनकी धर्मनिरपेक्षता मुझे चक्कर में डाल गयी थी.

____________________________________________________________________ संजीव निगम
डी - २०४,संकल्प-२,पिम्परिपाडा, फिल्म सिटी रोड,
मलाड [पूर्व], मुंबई-४०००९७.
ई -मेल :sanjiv_nigam@yahoo.co.in

Thursday, April 9, 2009

Peace is Your Birth Right

Dear Friends,

Om Namo Bhagvatey Vasudevaya.

Let us chant this mantra 108 times to gain peace when we are alone . The mantra is invocation and remembrance of the almighty God which is the supreme power and Universal. Whether you are sitting quietly in a corner or travelling in a crowded bus, chant this mantra to calm down, to gain peace, to gain your composure.

Friends, the world is going through a dangerous situation. The youth of today is distressed, disturbed and highly obsessed. They are left alone to fight for their causes, their problems, their tensions as their elders are also facing the same. Who will guide and to whom.

Guatam Budhha had told his students before his departure from this world" To be their own Lighted Lamp means thier own guide, thier own support'". The same is applicable today.

In this materialistic world People have forgotten that money is only the means and not the end. Money can buy luxuries but not the happiness. Happiness comes from contentment, from a deeply satisfied heart,.

Happiness is not dependant on luxries. Here are some tips to be happy when feeling depressed:

1] Find a corner for your self. Sit with close eyes and try to remember your such memories which brought smiles in your life for exmaple when you drew that funny picture of your teacher, when you made someone April fool , when you put salt instead of sugar etc . Indulge in those memories for sometime.

2] Hum your favourite song. Dont listen it on audio-video. You yourself hum it whether your voice is good or bad. Dont mind yourself. Let others mind it , Ha,ha , ha.

3] Have a hearty laugh. Full blooded laughter.Loud and clear.

4] Chant the mantra given above for sometime if 108 times i not possible.

5] Share your distressed feelings with us thinking that you are not alone in this world.

Let us begin our interaction to bring peace and smiles in our lives.We shall continue to share our views to get the real peace and happiness.

Om Shanti, Shanti, Shanti [ Let the peace be there.]

Sanjiv Nigam








The world is going through